गन्‍ना: प्रति एकड़ 100 मेट्रिक टन का लक्ष्‍य

गन्‍ना: प्रति एकड़ 100 मेट्रिक टन का लक्ष्‍य
February 6, 2018 No Comments Blog admin

सी-4 पौधा होने के कारण गन्‍ना सौर ऊर्जा को उपयोगी बायोमास में बदलने वाला एक सक्षम परिवर्तक है। सैद्धांतिक रूप से गन्‍ने की क्षमता करीब 525 किलोग्राम/दिन/एकड़ (188 मेट्रिक टन/एकड़/साल) होती है। आखिरकार गन्‍ने की पैदावार मिलेएबल गन्‍ने और प्रति एकड़ गन्‍ने के औसत वजन का परिणाम है। 100 मेट्रिक टन/एकड़ के लिये गन्‍ने 2 से 2.5 किलोग्राम औसत वजन के 40000-60000 प्रति एकड़ गन्‍ने होना चाहिये। 100 मेट्रिक टन/एकड़/मौसम के लक्ष्‍य को पाने के लिये नीचे कुछ मूलमंत्र दिये गये हैं।

  • मिट्टी का सही चुनाव– भारी, सही निकासी वाली, मिट्टी संबंधी गंभीर समस्‍या ना हो, सेंद्रिय कर्ब में बेहतर (0.75 से 1 प्रतिशत)। मिट्टी परीक्षण से पोषक तत्‍व और मिट्टी की सेहत के बारे में पता चलता है।
  • सही तरीके से जोती गई मिट्टी– हल द्वारा गहरी जुताई। गर्मी के मौसम में मिट्टी का सौरकरण करना उपयोगी होता है।
  • फसलों की अदला-बदली और हरी खाद– फलीदार फसलों के साथ फसलों की अदला-बदली करना और मिट्टी में ताग-धैंचा जैसी हरी खाद की फसल लगाना।
  • विविधतापूर्ण और बुआई की सामग्री का चुनाव– मौसम, क्षेत्र और मिट्टी के अनुसार सही किस्‍म का चुनाव करना जरूरी होता है। बुआई की जाने वाले बीज 9 से 10 महीने से ज्‍यादा पुरानी नहीं होनी चाहिये। एक आय बड सेट या पौधे पैसे बचाने और एकसमान फसल उगाने के लिये अच्‍छा विकल्‍प है। बीज को बोने से पहले कीटनाशकों और बायोफर्टिलाइजर से उपचारित किया जाना चाहिये।
  • बुआई का समय– बुआई के समय का पालन करना चाहिये। 18 महीने (जुलाई-अगस्‍त, 15 महीने (अक्‍टूबर-नवंबर) और 12 महीनों के लिये (जनवरी-फरवरी)
  • रोपण का आरेखन – जगह और पोषक तत्‍वों के आंतरिक संघर्ष को कम करने के लिये, चौड़े पौधों से जगह बनाने की प्रक्रिया को अपनाना चाहिये। पंक्ति में 4.5 फीट से 5 फीट के बीच और दो सेट के बीच 1.5 फीट से 2 फीट।
  • जैविक खाद का उपयोग– मिट्टी में सेंद्रिय पदार्थ (10-15 मेट्रिक टन/एकड़) का प्रयोग मिट्टी की संपूर्ण सेहत को बेहतर बनाता है, उसका परिणाम जड़ों और टहनियों की वृद्धि में नजर आता है।
  • उर्वरक का बेसल डोज प्रयोग– रोपण से पहले अजैविक उर्वरक का बेसल डोज प्रयोग करना आवश्‍यक होता है।
  • वृद्धि के लिये डब्‍ल्‍यूएसएफ ड्रेन्चिंग : गन्‍ने के जड़ों के करीब डब्‍ल्‍यूएसफ की ड्रेन्चिंग करने से सेहतमंद विकास होता है, जिससे पैदावार को बढ़ाने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिये 12:61:00 का 1 प्रतिशत घोल, 13:0:45, CaNO3 (0.05 प्रतिशत) +  बोरॉन (0.01 प्रतिशत), 1 प्रतिशत अमोनियम। सल्‍फेट+ 1 प्रतिशत MgSO4 आदि, र्स्‍टाटर के कुछ बेहतरीन ग्रेड हैं।
  • पौधों की वृद्धि के लिये नियंत्रक का प्रयोग– पीजीआर जैसे ऑक्झिंस, जिबरलिन्‍स और साइटोकिन्‍स का वृद्धि और पैदावार पर सकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है।
  • माइक्रोन्‍यूट्रिएंट्स की फॉलियर फीडिंग– फॉलियर फीडिंग बूस्‍टर की तरह काम करता है, इससे शुरुआती 4 महीनों तक पौधों की वृद्धि होती है।
  • बायोफर्टिलाइजर का प्रयोग– बायोफर्टिलाइजर जैसे पीएसबी, वीएएम, एफवाईएम के साथ ऍजोटो और एसिटोबैक्‍टर का प्रयोग करने से 25 प्रतिशत तक पोषक तत्‍वों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
  • पौधों का बढ़ना और पानी का दबाव– जड़ों को मजबूती प्रदान करने के लिये, पौधों की पर्याप्‍त वृद्धि होने (बुआई से 2 से 2.5 महीने) के बाद थोड़ी मात्रा में पानी का दबाव देना चाहिये, इससे जड़ों की मोटाई/गहराई बढ़ती है और नये पौधे उगने से रुक जाते हैं, जिससे मौजूदा पौधों को ताकत मिलती है। 2.5 महीने के चरण में पौधे जमीन से ऊपर उठ जाते हैं और 4 महीने का चरण पौधों को कुछ सहारा देते हैं, जिससे लॉजिंग में कमी आती है।
  • पानी का प्रबंधन – पोषक तत्‍वों के सही अवशोषण के लिये हवा का संतुलन होना बहुत जरूरी होता है और साथ ही सेहतमंद जड़ों और तनों से छुटकारा पाने के लिये। इसके लिये ड्रिप का प्रयोग करना सबसे बेहतर तरीका होता है।
  • खरपतवार और कीटनाशक का प्रबंधन– प्रभावी खरपतवारनाशी और कीटनाशक का समय पर प्रयोग कर खरपतवार और कीटों का प्रबंधन।

 

 

 

 

 

 

 

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