गन्ने की खेती में बुवाई के समय पोषक तत्व प्रबंधन और सामान्य कृषि प्रथाएं

गन्ने की खेती में बुवाई के समय पोषक तत्व प्रबंधन और सामान्य कृषि प्रथाएं
January 23, 2019 Comments Off on गन्ने की खेती में बुवाई के समय पोषक तत्व प्रबंधन और सामान्य कृषि प्रथाएं Blog,Blogs Hindi admin

महाधन का महामंत्र में आप सभी किसान भाइयों का मैं संजय शर्मा हार्दिक स्वागत करता हूँ,आप सभी किसान भाइयों को मेरा नमस्कार !

किसान भाइयो,आज हम महाधन का महामंत्र में आज के फेसबुक लाइव सेशन में गन्ने की खेती में बुवाई के समय पोषक तत्व प्रबंधन और सामान्य कृषि प्रथाओं पर चर्चा करेंगे और साथ ही गन्ने की अधिक उपज प्राप्त करने के लिए महाधन के गुणवत्तापूर्ण उर्वरकों के उपयोग पर चर्चा करेंगे ताकि किसान भाई महाधन के गुणवत्तापूर्ण खादों का उपयोग करके गन्ने की अधिक उपज प्राप्त कर सकें।

गन्ने की फसल में सामान्य कृषि प्रथाएं: किसान भाइयो, अब हम सर्वप्रथम गन्ने की फसल में उत्पादन को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों एवं सामान्य कृषि प्रथाओं पर पर चर्चा करेंगे ।

गन्ना बहुत ही सुरक्षित महत्वपूर्ण बहुवर्षीय व अधिक मुनाफा देने वाली नगद फसल है। गन्ना की फसल गुड़ व चीनी का प्रमुख स्रोत है। विश्व में गन्ना व चीनी उत्पादन में भारत दूसरे स्थान पर है। देश में गन्ने की खेती उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र,आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु तथा कर्नाटक में प्रमुखता से की जाती है।

उपयुक्त जलवायु: गन्ना गर्म एवं नम जलवायु और यह एक लंबी अवधि की फसल है। गन्ने के सर्वोत्तम जमाव के लिये 26-30 डिग्री से0 तापक्रम उपयुक्त है। बढ़वार के लिए 32 से 37 डिग्री से0 तापमान उत्तम होता है। तापमान 15 डिग्री से0 से कम और 45 डिग्री से0 से अधिक होने पर फसल की बढ़वार नहीं होती।

मिट्टी का प्रकार: दोमट मिट्टी से चिकनी दोमट तथा काली भारी मिट्टी जिसमें पानी का अच्छा निकास हो गन्ने हेतु सर्वोत्तम होती है। 6.5 पी.एच.मान वाली भूमि गन्ने की फसल में के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। गन्ने की फसल में अम्लीयता एवं क्षारीयता को सहने की क्षमता होती है अतः इसकी खेती 5 से 8.5 पी.एच.मान वाली भूमि में आसानी से की जा सकती है।

खेत की तैयारी : गन्ना बहुवर्षीय फसल है, इसके लिए खेत की गहरी जुताई के पश्चात् 2 बार कल्टीवेटर व आवश्यकता अनुसार रोटावेटर व पाटा चलाकर खेत तैयार करें, मिट्टी भुरभुरी होना चाहिए इससे गन्ने की जड़े गहराई तक जाएगी और आवश्यक पोषक तत्व का अवशोषण करेगी।

बोआई का समय : उत्तर भारत में मुख्यतह: फरवरी-मार्च में गन्ने की बसंत कालीन बुवाई की जाती है।गन्ने की अधिक पैदावार लेने के लिए सर्वोत्तम समय अक्टूबर – नवम्बर है।बसंत कालीन गन्ना 15 फरवरी-मार्च में लगाना चाहिए। उत्तर भारत में बुवाई का विलम्बित समय अप्रैल से 16 मई तक है।

गन्ना बीज का चुनाव : कम से कम 9 से 10 माह की उम्र का गन्ना ही बीज के लिए उपयोग करें गन्ना बीज उन्नत जाति, मोटा, ठोस, शुद्ध व रोग रहित हो,गन्ना की ऑख पूर्ण विकसित तथा फूली हुई हो उसी गन्ने का बीज के लिए उपयोग करें। जिस गन्ने की छोटी पोर हो फूल आ गये हो,ऑख अंकुरित हो या जड़े निकली हो ऐसा गन्ना बीज के लिए उपयोग न करें।

बीज दर एवं अंतरण : सामान्यत: गन्ने की बुवाई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सेमी. से लेकर 60 सेमी. (विलम्ब से गन्ना बोवाई की दशा में, कम सिंचाई की उपलब्धता) तक रखी जाती है। पंक्ति से पंक्ति के मध्य 90 सेमी. दूरी रखने एवं तीन आंख वाले टुकड़े बोने पर लगभग 15 हजार टुकड़ों की अथवा गन्ने की मोटाई अनुसार लगभग 25 से 30 कुन्तल बीज गन्ना प्रति एकड़ की दर से एवं पंक्तियों के मध्य की दूरी 60 से0मी0 रखने तथा तीन आंख वाले टुकड़े बोने पर लगभग 22500 टुकड़ों की अथवा गन्ने की मोटाई अनुसार 30 से 40 कुन्तल गन्ना बीज की प्रति एकड़ आवश्यकता होती है।

बुवाई की विधि व बीजोपचार: उत्तर भारत में गन्ने की बुवाई मुख्यतः समतल और नाली विधि से की जाती है समतल विधि में 90 सेमी. की दूरी पर 7-10 सेंमी.गहरे देशी हल से कूँड़ बनाएं और कूँड़ों में गन्ने के छोटे -छोटे टुकड़े जिनमे 2 से 3 आँखें हो की बुवाई सिरे से सिरा मिला कर की जाती है।नाली विधि में 90 सेमी की दूरी पर 45 सेमी चौड़ी, 15-20 सेंमी.गहरी नाली बना ली जाती है एवं नाली में बीज को सिरे से सिरा मिलाकर बुवाई की जाती है गन्ने की आंखे आजू-बाजू में हो ऐसा रखें दोनों आंखे नाली की बगल की तरफ रहनी चाहिए। बुवाई के समय कूँड़ में पहले उर्वरक डालें उसके ऊपर गन्ने के बीज की बुवाई करें।

बोने से पूर्व गन्ने के दो अथवा तीन ऑंख वाले टुक्ड़े काटकर कम से कम 2 घण्टे पानी में डुबो लेना चाहिये, तदुपरान्त एरीटान 250 ग्राम या कार्बनडाईजिम 100 ग्राम,क्लोरोपयरीफास 300 मि.लि.100 लीटर पानी में घोल बनाकर बीज के टुकडो को 10 मिनिट तक घोल में डूबाकर उपचारित करे।

सिंचाई: नमी की कमी की दशा में बुवाई के 20-30 दिन के बाद एक हल्की सिंचाई करने से अपेक्षाकृत अच्छा जमाव होता है। ग्रीष्म ऋतु में 15-20 दिनों के अन्तर पर सिंचाई करते रहना चाहिये। वर्षाकाल में गन्ने की बढ़तवार होती है। अतः 20 दिन तक वर्षा न होने पर एक सिंचाई करना उपयोगी पाया गया है।सूखी पत्ती बिछाकर नमी को सुरक्षित रखना उपज के दृष्टिकोण से लाभप्रद पाया गया है।

खरपतवार नियंत्रण: सिमैजीन (50 डब्लू) 1 किग्रा./एकड़ की दर से जमाव पूर्व व जमाव के उपरान्त प्रयोग करें।आईसेप्लेनोटाक्स मोथा एक बीजपत्रीय खरपतवारों के प्रभावी सुनियंत्रण हेतु 1 किग्रा./हे० की दर से जमाव पूर्व व पश्चात छिड़कना चाहिये।एट्राजीन 1 कि०ग्रा०/एकड़ जमाव पूर्व तथा 2-4-डी-८०० ग्राम /एकड़ जमाव पश्चात छिडकने से अधिकांश एकबीजपत्रीय व द्विबीजपत्रीय नष्ट हो जाते हैं।

अन्तः फसल : बसंत कालीन गन्ने में दो पंक्तियों के बीच में मूंग उर्द लोबिया भिंडी लोकी तोरई खीरा ककड़ी इत्यादि की फसल ली जा सकती है जिसमे अलग से खाद पानी नहीं डालना पड़ता और अतिरिक्त आय भी किसान भाइयों को हो जाती है

मिट्‌टी चढना: गन्ने के थानो की जड़ पर मिट्‌टी चढने से जड़ों का सघन विकास होता है। इससे देर से निकले कल्लों का विकास रूक जाता और वर्षा ऋतु में फसल गिरने से बच जाती है। मिट्‌टी चढने से स्वतः निर्मति नालियॉं वर्षा में जल निकास का कार्य भी करती है। अतः अन्तिम जून में एक बार हल्की मिट्‌टी चढना तथा जुलाई में अन्तिम रूप से पर्याप्त मिट्‌टी चढकर गन्ने को गिरने से बचाकर अच्छी फसल ली जा सकती है।

बॅंधाई: जब गन्ने २.5 मीटर से अधिक लम्बे हो जाते हैं तो वे वर्षाकाल में गिर जाते हैं जिससे उसके रसोगुण पर विपरीत प्रभाव पड जाता है। अतः गन्ने के थानों को गन्ने की सूखी पत्तियों से ही लगभग 100 से०मी० ऊॅंचाई पर जुलाई के अन्तिम सप्ताह में तथा दूसरी बॅंधाइ्र अगस्त में पहली बॅंधाई से 50 सेमी. ऊपर तथा अगस्त के अन्त में एक पंक्ति के दो थान व दूसरी पंक्ति के एक थान से और इस क्रम को पलटते हुये त्रिकोणात्मक बॅंधाई करनी चाहिये।

गुड़ाई : गन्ने में पौधों की जड़ों को नमी व वायु उपलब्ध कराने तथा खर-पतवार नियंत्रण के दृष्टिकोण से गुड़ाई अति आवश्यक है। सामान्यत: प्रत्येक सिंचाई के पश्चात एक गुड़ाई की जानी चाहिए। गुड़ाई करने से उर्वरक भी मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाता है। गुड़ाई के लिए कस्सी/ फावड़ा/कल्टीवेटर का प्रयोग किया जा सकता है।

बुवाई के समय पोषक तत्व प्रबंधन: अगर उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की जाँच के उपरांत किया जाए तो उससे कम लागत में अच्छी उपज ली जा सकती हैं।खेत में 4-5 टन प्रति एकड़ की दर से सडी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट फैलाकर जुताई के समय बुवाई पूर्व मिट्टी में मिला देना चाहिए । उत्तर भारत में गन्ने के सर्वोत्तम उत्पादन के लिए औसतन प्रति एकड़ तत्व 80 कि.ग्रा.नाइट्रोजन, 35 कि.ग्रा. फास्फोरस तत्व,30 कि.ग्रा.पोटाश तत्व एवं 30 कि.ग्रा. कैल्शियम, 15 कि.ग्रा.सल्फर व 10 कि.ग्रा.जिंक सल्फेट की सिफारिश की गयी है। नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस ,पोटाश एवं कैल्शियम की पूरी मात्रा बुवाई के समय डाल देनी चाहिए शेष नाइट्रोजन की मात्रा दो बार में फुटान होने के समय और वर्षा शुरू होने से पहले देना चाहिए।

अतः गन्ने की बुवाई के समय खाद की मात्रा प्रति एकड़ महाधन स्मार्टेक 12:32:16-110 किग्रा प्रति एकड़ ,यूरिया 40 किग्रा प्रति एकड़ , 30 कि.ग्रा. महाधन कैल्शियम नाइट्रेट, महाधन बेनसल्फ FRT-15 किग्रा प्रति एकड़,महाधन मैगनीशियम सल्फेट-5 किग्रा प्रति एकड़,महाधन फेरस सल्फेट-5 किग्रा प्रति एकड़,महाधन जिंक सल्फेट-10 किग्रा प्रति एकड़,महाधन बोरॉन (डीटीबी)-1 किग्रा प्रति एकड़ की दर से बुवाई के समय उपयोग करें।

नोट: : अधिकांशतः किसान भाई गन्ने की फसल में डी.ए.पी. यूरिया एवं म्यूरेट ऑफ़ पोटाश का उपयोग करते है। सल्फर,जो कि गन्ने की फसल में चौथा आवश्यक पोषक तत्व है, जिस पर किसान भाई प्रायः ध्यान नहीं देते है। जिसके फलस्वरूप गन्ने की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ।

महाधन बेनसल्फ FRT – फ़ास्ट रिलीज टेक्नोलॉजी पर आधारित है

  • कम नमी में भी गंधक फसल को शीघ्रता से उपलब्ध होता है।
  • मृदा के पीएच मान में सुधार और मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करता है।
  • गन्ने की फसल में रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाता है।
  • गन्ने में चीनी की मात्रा और रस की गुणवत्ता में सुधार करता है।
  • गन्ने के उत्पादन में वृद्धि करता है ।

अतः सभी किसान भाई गन्ने में बुवाई के समय और पेड़ी गन्ने में खेत की नमी में महाधन बेनसल्फ FRT 15 किलो /एकड़ का प्रयोग अवश्य करें।

पेड़ी गन्ने में और जिस गन्ने की बुवाई अक्टूबर -नवंबर माह में (शरद कालीन) कर चुके है वे किसान भाई अभी पेड़ी गन्ने में महाधन स्मार्ट 24:24:00 का 10 से 12 ग्राम /लीटर पानी की दर से 250 से 300 लीटर पानी घोल बनाकर छिड़काव करें। (2.5 to 3 Kg/Acre)

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