कपास की खेती युक्तियाँ

कपास गर्म मौसम की फसल है। यह 850 से 1100 मिमी की वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह से उगता है। यह ज्यादातर वर्षा आधारित फसल के रूप में भारत में उगाया जाता है। हालाँकि, सिंचाई सुविधाओं और ड्रिप प्रणाली के साथ, कपास किसानों को अधिक लाभ देती है।

काली कपास मिट्टी जो अच्छी तरह से सूखी हो, कपास की फसल के लिए सबसे उपयुक्त होती है।

मिट्टी की ठीक मात्रा में एक जुताई के बाद दो या तीन पाटा लगाने के द्वारा अच्छी जुताई प्राप्त हो जाती है।

1 बीज/ hil की बुआई की अनुशँसा की जाती है। किसी भी अंतराल के मामले में, बोवाई के 10-12 दिनों के भीतर भरने की जानी चाहिए। इष्टतम किसानों द्वारा उगाई जाने वाली संकर / किस्म के प्रकार पर निर्भर करता है।

किसानों को उनकी पसंद और सुविधा के अनुसार नियमित रूप से अंतः-सांस्कृतिक व्यवहार करने की सलाह दी जाती है। इंटरकल्चरल संचालन मिट्टी को अच्छी तरह से वातित रखने और खरपतवार को जाँच के अधीन रखने में सहायता करते हैं।

कपास की फसल में कम से कम 3 साल में एक बार 4 – 6 टन/एकड़ की दर से एफआईएम या कंपोस्ट खाद डाली जानी चाहिए। सिंचाई वाली कपास की फसल को वर्षा आधारित कपास की फसल की तुलना में अधिक पोषण की आवश्यकता होती है। वर्षा-आधारित और सिंचित दोनों स्थितियों में नाइट्रोजन उर्वरक टुकड़ों में प्रयोग की जानी चाहिए।

नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर, आयरन, मैंगनीज, ज़िंक, कॉपर, और बोरान

Nutrient Mahadhan Product
नाइट्रोजन महापावर (महाधन 24:24:00)
फॉस्फोरस महापावर (महाधन 24:24:00)
पोटाशियम महाधन पोटाश
कैल्शियम महाधन कैल्शियम नाइट्रेट (फील्ड ग्रेड)
मैग्नीशियम महाधन मैगसल्फ
सल्फर महाधन बेनसल्फ
आयरन महाधन क्रान्ति फेरस सल्फ (मिट्टी में प्रयोग के लिए)महाधन तेज़ फेरस (ड्रिप प्रयोग के लिए)
ज़िंक महाधन क्रान्ति ज़िंकसल्फ (मिट्टी में प्रयोग के लिए महाधन तेज़ ज़िंक (ड्रिप प्रयोग के लिए)
मैंगनीज महाधन मैंगनीज सल्फेट
कॉपर महाधन कॉपर सल्फेट
बोरोन महाधन तेज़ बोरोन

ड्रिप सिंचाई सुविधा रहित कपास किसानों के लिए उर्वरक उत्पाद अनुशंसा (मिट्टी में उपयोग) (तालिका 1)

 

ड्रिप सिंचाई सुविधा वाले किसानों के लिए फर्टिगेशन अनुसूची अनुशंसा नीचे दी गई है (तालिका 2):

 

 

सभी कपास किसानों के लिए उर्वरक उत्पादों के पत्तियों पर प्रयोग (फोलियर एप्लिकेशन) की अनुशंसा (तालिका 3)

यद्यपि अधिकांशतः कपास की फसल वर्षा आधारित की फसल के रूप में उगाई जाती है, तब भी यह सलाह दी जाती है कि जहाँ कहीं भी सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो वहाँ फसल की अवधि के विभिन्न चरणों में नियमित सिंचाई की जाना चाहिए। जैसे ही यह परिपक्वता तक पहुँचती है तो किसानों को फसल की सिंचाई करना बंद कर देना चाहिए और बुवाई के 150 या 160 दिनों के बाद कोई सिंचाई नहीं करनी चाहिए। कपास जल भराव के प्रति संवेदनशील होता है। इसलिए, मानसून के समय के दौरान अतिरिक्त पानी को निकालने का ध्यान रखा जाना चाहिए।

खरपतवार

कपास की फसल पर घास, चौड़ी पत्ते वाली खरपतवार, और नरकुल सहित कई खरपतवारों से पीड़ित होती है। किसानों को खरपतवारों को या तो हाथ से उखाड़ कर हर्बीसाइड का उपयोग करके नियंत्रित करना चाहिए।

खरपतवार प्रबंधन

उगने से पूर्व, कपास की बुवाई के 3 दिनों के भीतर निम्नलिखित में से किसी भी एक हर्बीसाइड के उपयोग की अनुशंसा की जाती है।

  1. पेन्डिमेथैलिन 30% ईसी – 1000 मिलीलीटर/एकड़;
  2. पेन्डिमेथैलिन 38.7% सीएस – 700 मिलीलीटर/एकड़;

ग्लाइफोसेट 36% एसएल (@ 1 लीटर/एकड़) या पाइरिथियोबैक सोडियम 10% ईसी (@ 250 मिलीलीटर/एकड़) या प्रोपेक्विज़ाफ़ॉप 10% ईसी (@ 250 मिलीलीटर/एकड़) जैसे किसी भी गैर-चयनात्मक उगने के पश्चात हर्बीसाइड का छिड़काव बुवाई चरण के केवल 60-70 दिन बाद ही किया जाना चाहिए, और वह भी एक सुरक्षात्मक ढाल या हुड का उपयोग करके किसी स्प्रेयर से ताकि छिड़काव फसल पर नहीं गिरे।

बीटी कपास के आगमन के साथ, बॉलवॉर्म और अन्य चबाने वाली कीटों की घटनाएँ अल्पतम होती हैं। हालाँकि, कीट-अनुकूल परिस्थितियों में कीट से ग्रस्त होने की भारी घटनाओं के समय कपास के खेतों में उनकी घटनाएँ देखी जा सकती हैं: ये अमेरिकी बॉलवॉर्म या फ्रुट बोरर, धब्बेदार बॉलवॉर्म, गुलाबी बॉलवॉर्म और तंबाकू कैटरपिलर हैं।

बोरर्स, बॉलवॉर्म और कैटरपिलर के नियंत्रण के लिए प्रबंधन प्रथा

  • कपास के साथ बीच की फसल या सीमा फसल के साथ-साथ हरा चना, काला चना, सोयाबीन, अरंडी, ज्वार आदि जैसी कम पसंद वाली फसलों को उगाना।
  • फसल के अवशेषों को हटाना और नष्ट करना
  • न्युक्लिअर पॉलीहेड्रोसिस वायरस (एनपीवी) का प्रयोग
  • क्विनालफोस 25 ईसी @ 20 मिलीलीटर/10 लीटर पानी या कार्बैरिल 50 डब्ल्यूपी @ 40 ग्राम/10 लीटर पानी या स्पिनोसैड 45/एससी @ 0.01% या बीटा-साइफ्लुट्ट्रिन 2.5 ईसी @ 0.0025% या साइपरमेथ्रीन 10 ईसी @ 7.5 मिलीलीटर/10 लीटर पानी या साइपरमेथ्रीन 25 ईसी @ 3.0 मिलीलीटर/10 लीटर पानी या फेनवैलेरेट 20 ईसी @ 6 मिलीलीटर/10 लीटर पानी या डिकामेथ्रीन 2.8 ईसी @ 9 मिलीलीटर/10 लीटर पानी या फ्लुवैलिनेट 20 ईसी 4.5 मिलीलीटर/10 लीटर पानी, जैसे कीटनाशकों का छिड़काव

चूसने वाली कीटों की घटना आजकल अधिकांश कपास क्षेत्रों में अधिक दिखाई देती है। सामान्यतः होने वाले चूसने वाले कीट हैं: फुदका (जैसीड), चेपा (एफिड्स), सफेद मक्खी, तेला (थ्रिप्स), घुन, और चूर्णी मत्कुण (मीली बग)।

चूसने वाले कीटों के नियंत्रण के लिए प्रबंधन उपायों

  1. चेपा (एफिड्स), फुदका (जैसीड) और तेला (थ्रिप्स)
    मिथाइल डेमेटोन 25 ईसी @ 8 मिलीग्राम/10 लीटर पानी या एसिटामाइप्रिड 20 एसपी @ 100 ग्रा/एकड़ या स्पाइनेटोरम 120 एससी – 180 मिलीलीटर/एकड़ या स्पाइनोसैड – 75 मिलीलीटर/एकड़ या एसेफेट- 300 ग्राम/एकड़ या इमिडाक्लोप्रिड- 150 मिलीलीटर/एकड़ या फाइप्रोनिल 5% एससी – 260 मिलीलीटर/एकड़ का छिड़काव।
  2. सफेद मक्खी के लिए
    मिथाइल डेमेटन 25 ईसी @ 40 मिलीलीटर/10 लीटर पानी या डायमेथोएट 30 ईसी @ 33 मिलीलीटर/10 लीटर पानी या ट्राइज़ोफॉस 25 ईसी @ 10 मिलीलीटर/10 लीटर पानी या फेनप्रोपेथ्रीन 50 ईसी @ 10 मिलीलीटर/10 लीटर पानी या एसिटामाइप्रिड @ 100 ग्राम/एकड़ या डिसेन्थियुरॉन @ 250 ग्राम/एकड़ या पायरिप्रॉक्सीफ़ेन @ 400 मिलीलीटर/एकड़ का छिड़काव।

  1. उकटा रोग (फुजेरियम विल्ट)
    प्रबंधन
    • अम्ल-डिलिंट किए गए बीज का 4 ग्राम/किग्रा पर कार्बोक्सीन या कार्बेन्डाज़िम के साथ उपचार करें।
    • जून-जुलाई के दौरान गहरी गर्मियों की जुताई के बाद मिट्टी में संक्रमित पौधों के मलबे को निकालें और जला दें।
    • नाइट्रोजनी और फॉस्फेट उर्वरकों की एक संतुलित खुराक के साथ पोटाश की बढ़ी हुई खुराक का प्रयोग करें।
    • 100 टन/हेक्टर पर फार्म की खाद या अन्य कार्बनिक खाद की भारी खुराक का प्रयोग करें।
    • धब्बों को 0.05% बेनोमाइल या 0.1% कारबेन्डैज़िम से भिगोएँ।
  2. अल्टरनेरिया पत्ती मुरझाना
    प्रबंधन
    • संक्रमित पौधे के अवशेषों को निकालें और नष्ट करें।
    • रोग की सूचना पर 2 किग्रा/हेक्टेयर पर मैनकोज़ेब या कॉपर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव करें।
    • 15 दिनों के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव किए जा सकते हैं।
  3. जीवाणु मुरझाना (बैक्टीरियल ब्लाइट)
    प्रबंधन
    • अम्ल-डिलिंट किए गए बीज का 2 ग्राम/किग्रा पर कार्बोक्सीन या ऑक्सी कार्बोक्सीन से उपचार करें या रातभर 1000 पीपीएम स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट में बीजों को भिगो कर रखें।
    • संक्रमित पौधों के मलबे को हटाएँ और नष्ट करें।

  1. 7 दिनों से कम के अंतराल पर, लगातार फसल को काटें।
  2. जब पत्तियों में नमी होती है तो सुबह के समय 10 से 11 बजे तक ही फसल को काटें।
  3. कपास को केवल अच्छी तरह से फटे हुए बीजकोषों से ही चुनें केवल।
  4. बीजकोषों में से केवल कपास को ही निकालें और सहपत्रों को पौधों पर ही छोड़ दें।
  5. कपास को बीनने के बाद, फूले हुओं को छाँटें और अलग रखें।
  6. दागी, रंग उतरे हुए और कीटों का आक्रमण हुए कपास को अलग-अलग रखें।

नोट: दागी, रंग उतरे हुए और कीटों से क्षतिग्रस्त हुए कपास को अच्छे कपास के साथ नहीं रखें, क्योकि वे अच्छे कपास को भी खराब कर देंगे और उत्पाद के बाजार मूल्य को कम कर देंगे।

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